POCSO

#_पोक्सो_क़ानून_क्या_है_और_कैसे_बच्चों_को_यौन_शोषण_से_संरक्षण_प्रदान_करता_है

POCSO एक्ट का पूरा नाम "The Protection Of Children From Sexual Offences Act" या प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट है.

पोक्सो एक्ट-2012; को बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए, महिला और बाल विकास मंत्रालय ने बनाया था.

वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है.

पोक्सो अधिनियम की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के गुप्तांग से छेडछाड़ की जाती है, इस धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर 5 से 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है.

इस एक्ट को बनाना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि बच्चे बहुत ही मासूम होते हैं और आसानी से लोगों के बहकाबे में आ जाते हैं. कई बार तो बच्चे डर के कारण उनके साथ हुए शोषण को माता पिता को बताते भी नही है.

#_इस_एक्ट_के_प्रावधान_इस_प्रकार_हैं

#_यौन_शोषण_की_परिभाषा_इसमें यौन उत्पीड़न और अश्लील साहित्य, सेक्सुअल और गैर सेक्सुअल हमला को शामिल किया गया है.

1. इसने भारतीय दंड संहिता, 1860 के अनुसार सहमती से सेक्स करने की उम्र को 16 वर्ष से बढाकर 18 वर्ष कर दिया है .इसका मतलब है कि-

(a) यदि कोई व्यक्ति (एक बच्चा सहित) किसी बच्चे के साथ उसकी सहमती या बिना सहमती के यौन कृत्य करता है तो उसको पोक्सो एक्ट के अनुसार सजा मिलनी ही है.

(b) यदि कोई पति या पत्नि 18 साल से कम उम्र के जीवनसाथी के साथ यौन कृत्य कराता है तो यह अपराध की श्रेणी में आता है और उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है.

2. यह अधिनियम पूरे भारत पर लागू होता है और 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधों के खिलाफ संरक्षण प्रदान करता है.

3. पोक्सो कनून के तहत सभी अपराधों की सुनवाई,
एक विशेष न्यायालय द्वारा कैमरे के सामने बच्चे के माता पिता या जिन लोगों पर बच्चा भरोसा करता है, उनकी उपस्थिति में की कोशिश करनी चाहिए.

4. यदि अभियुक्त एक किशोर है, तो उसके ऊपर किशोर न्यायालय अधिनियम, 2000 (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) में मुकदमा चलाया जाएगा.

5. यदि पीड़ित बच्चा विकलांग है या मानसिक रूप से या शारीरिक रूप से बीमार है, तो विशेष अदालत को उसकी गवाही को रिकॉर्ड करने या किसी अन्य उद्येश्य के लिए अनुवादक, दुभाषिया या विशेष शिक्षक की सहायता लेनी चाहिए.

6. यदि अपराधी ने कुछ ऐसा अपराध किया है जो कि बाल अपराध कानून के अलावा अन्य कानून में भी अपराध है तो अपराधी को सजा उस कानून में तहत होगी जो कि सबसे सख्त हो.

7. इसमें खुद को निर्दोष साबित करने का दायित्व अभियुक्त (accused) पर होता है . इसमें झूठा आरोप लगाने, झूठी जानकारी देने तथा किसी की छवि को ख़राब करने के लिए सजा का प्रावधान भी है.

8. जो लोग यौन प्रयोजनों के लिए बच्चों का व्यापार  करते हैं उनके लिए भी सख्त सजा का प्रावधान है.

9. सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय बाल संरक्षण मानकों के अनुरूप, इस अधिनियम में यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति यह जनता है कि किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ है तो उसके इसकी रिपोर्ट नजदीकी थाने में देनी चाहिए, यदि वो ऐसा नही करता है तो उसे छह महीने की कारावास और आर्थिक दंड लगाया जा सकता है.

10. यह अधिनियम बाल संरक्षक की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपता है. इसमें पुलिस को बच्चे की देखभाल और संरक्षण के लिए तत्काल व्यवस्था बनाने की ज़िम्मेदारी दी जाती है. जैसे बच्चे के लिए आपातकालीन चिकित्सा उपचार प्राप्त करना और बच्चे को आश्रय गृह में रखना इत्यादि.

11. पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि मामले को 24 घंटे के अन्दर बाल कल्याण समिति (CWC) की निगरानी में लाये ताकि CWC बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठा सके.

12. इस अधिनियम में बच्चे की मेडिकल जांच के लिए प्रावधान भी किए गए हैं, जो कि इस तरह की हो ताकि बच्चे के लिए कम से कम पीड़ादायक हो. मेडिकल जांच बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जाना चाहिए, पर बच्चे का विश्वास हो, और बच्ची की मेडिकल जांच महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए.

13. इस अधिनियम में इस बात का ध्यान रखा गया है कि न्यायिक व्यवस्था के द्वारा फिर से बच्चे के ऊपर ज़ुल्म न किये जाएँ. इस एक्ट में केस की सुनवाई एक स्पेशल अदालत द्वारा बंद कमरे में कैमरे के सामने दोस्ताना माहौल में किया जाने का प्रावधान है. यह दौरान बच्चे की पहचान गुप्त रखने की कोशिश की जानी चाहिए.

14. विशेष न्यायालय, उस बच्चे को दिए जाने वाली मुआवजे की राशि का निर्धारण कर सकता है, जिससे बच्चे के चिकित्सा उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था की जा सके.

15. अधिनियम में यह कहा गया है कि बच्चे के यौन शोषण का मामला घटना घटने की तारीख से एक वर्ष के भीतर निपटाया जाना चाहिए.

#_पोक्सो_एक्ट_की_धाराएं_व_सजा

इस एक्ट की #_धारा_3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को परिभाषित किया गया है। इसमें अगर कोई शख्स किसी बच्चे के प्राइवेट पार्ट में कुछ डालता है, या ऐसा करने के लिए कहता है तो यह धारा-3 के तहत अपराध होगा। इसमें 7 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।

#_एक्ट_की_धारा_4 में बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले को शामिल किया गया है। इसमें उम्रकैद और अर्थदंड का प्रावधान है।

#_इस_कानून_की_धारा_6 में वे मामले आते हैं जिनमें बच्चों को दुष्कर्म के बाद गंभीर चोट पहुंचाई गई हो, इसमें 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। इसके अलावा जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

#_धारा_7_व_धारा_8 में वे मामले आते हैं, जिनमें बच्चों के प्राइवेट पार्ट्स से छेड़छाड़ की जाती है। इस धारा के दोषियों को 5-7 तक की कैद की सजा व जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

#_धारा_11 में बच्चों के साथ सेक्सुअल हैरेसमेंट को परिभाषित किया गया है, जिसके तहत अघर कोई व्यक्ति बच्चों को गलत नियत से छूता है या सेक्सुअल हरकत करता है, या उसे पोर्नोग्राफी दिखाता है तो उसे इस धारा के तहत 3 साल कैद की सजा हो सकती है।

#_इस_एक्ट_में_2018_में_कुछ बदलाव भी किए गए हैं।
अब इसमें और ठोस सजा जोड़ी गई है। नए बदलाव के अनुसार #_अब_12_साल से कम उम्र की बच्चियों से रेप के मामले में मौत की सजा होगी।
#_जबकि_16_साल से कम उम्र की लड़की से रेप करने पर न्यूनतम सजा को 10 साल से बढ़ाकर 20 कर दिया गया है।

#_ज्यादातर मामलों में देखने में आया है कि बच्चों का शोषण जान-पहचान के लोग ज्यादा करते हैं और घर के लोग उन पर शक भी नही करते हैं.इसलिए माता- पिता का यह दायित्व बनता है कि जिन लोगों के साथ बच्चे खेल रहे हैं उन पर पूरी नजर रखें.

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