बच्चों के साथ यौन अपराध और पॉक्सो
बच्चों के साथ यौन अपराध और पॉक्सो.....
बच्चों के साथ आए दिन यौन शोषण और छेड़खानी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं जोकि समाज और देश के लिये अत्यंत चिंता का विषय है। गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के नवीनतम आंकड़ों में कहा गया है कि वर्ष 2015 से 2016 के बीच देश में ऐसे मामलों में 11 फीसदी की वृद्धि हुई है।
भारत में प्रत्येक दिन लगभग 290 बच्चे विभिन्न अपराधों के शिकार हो रहे हैं। बीते दो वर्षों के दौरान तो ऐसे मामलों में चार गुनी वृद्धि हुई है। सामाजिक और गैर-सरकारी संगठनों ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठाने की बात कही है। उनका दावा है कि ऐसे हजारों मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पाते। असली स्थिति और ज्यादा गंभीर है।
आकंड़े:
वर्ष 2001 से 2016 के बीच भारत में बच्चों के विरुद्ध अपराध के 595089 मामले दर्ज किये गए। इनमें से 290553 यानी 49 प्रतिशत मामले तो आखिरी तीन सालों (2014 से 2016) में ही दर्ज हुए। वर्ष 2013 और 2014 के बीच बच्चों के प्रति अपराध के मामलों में 54 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।
वर्ष 2001 से 2016 के बीच के सोलह वर्षों में भारत में बच्चों के बलात्कार और यौन अपराध के कुल 1,53,701 मामले दर्ज किए गए। जहां बच्चों से बलात्कार और गंभीर यौन उत्पीडन (पॉक्सो के तहत) सबसे ज़्यादा मामले दर्ज हुए हैं, उनमें मध्य प्रदेश (23,659-15%), उत्तर प्रदेश (22,171-14%), महाराष्ट्र (18,307-12%), छत्तीसगढ़ (9,076-6%) और दिल्ली (7,825-5%) शामिल हैं।
बढ़ते यौन अपराध:
भारत में प्रत्येक 10 बच्चों में एक बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। यहां प्रत्येक 155 मिनट में 16 साल से कम उम्र के एक बच्चे का रेप होता है जबकि हर 13वें घंटे में दस साल के कम उम्र के बच्चे के साथ दुष्कर्म होता है। विशेषज्ञों के अनुसार बाल यौन शोषण की बढ़ती घटनाएं काफी गंभीर विषय हैं जो बच्चों के मष्तिष्क पर गहरा दुष्प्रभाव डालती है।
यह भी एक बड़ा तथ्य है कि बच्चों के साथ यौन शोषण और छेड़खानी की 90 फीसदी घटनाएं परिचितों द्वारा ही होती है और वे रिश्तेदारों, परिवारजनों और पड़ौसियों द्वारा ही शोषण का शिकार होते हैं। बच्चों को यदि शुरु से ही गुड टच और बैड टच के बारे में बताया जाए तो इस तरह की घटनाओं पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।
प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट (पॉक्सो):
पॉक्सो एक्ट-2012 को बच्चों के प्रति यौन उत्पीड़न और यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए, महिला और बाल विकास मंत्रालय ने बनाया था। वर्ष 2012 में बनाए गए इस कानून के तहत अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा तय की गई है।
देश में बच्चियों के साथ बढ़ते यौन अपराधों को रोकने के लिए 'पॉक्सो ऐक्ट-2012' में संशोधन किया गया है, जिसके तहत अब 12 साल तक की बच्ची से रेप के दोषियों को मौत की सजा मिलेगी। सरकार की ओर से रखे गए इस प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी अप्रैल 2018 में मिल गई है। अब सरकार इसके लिए अध्यादेश लाएगी।
पॉक्सो एक्ट की धारा 7 और 8 के तहत वो मामले पंजीकृत किए जाते हैं जिनमें बच्चों के गुप्तांग से छेडछाड़ की जाती है, इस धारा के आरोपियों पर दोष सिद्ध हो जाने पर 5 से 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
पॉक्सो एक्ट की धारा 3 के तहत पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को भी परिभाषित किया गया है। जिसमें बच्चे के शरीर के साथ किसी भी तरह की हरकत करने वाले शख्स को कड़ी सजा का प्रावधान है।
इस एक्ट को बनाना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि बच्चे बहुत ही मासूम होते हैं और आसानी से लोगों के बहकाबे में आ जाते हैं। कई बार तो बच्चे डर के कारण उनके साथ हुए शोषण को माता पिता को बताते भी नही है।
पॉक्सो कनून के तहत सभी अपराधों की सुनवाई, एक विशेष न्यायालय द्वारा कैमरे के सामने बच्चे के माता पिता या जिन लोगों पर बच्चा भरोसा करता है, उनकी उपस्थिति में की कोशिश करनी चाहिए।
यदि अभियुक्त एक किशोर है, तो उसके ऊपर किशोर न्यायालय अधिनियम, 2000 (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) में मुकदमा चलाया जाएगा।
पोक्सो के अंतर्गत बच्चों के खिलाफ यौन अपराध के 6118 मामले 2012 से 2016 के बीच दर्ज किये गए हैं। इसमें 85% मामले अभी भी कोर्ट में लंबित पड़े हुए है जबकि अपराधी को सजा मिलने की दर सिर्फ 2% है जो कि किसी भी तरह से ठीक नही ठहराया जा सकता है।
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