मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग -
मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग -
कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू से मुलाकात कर उन्हें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने का प्रस्ताव सौंपा है।
इस प्रस्ताव में 71 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें से 7 सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसमें मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ दुर्व्यवहार के पांच आरोपों की सूची है। अगर राज्य सभा के अध्यक्ष ने ये प्रस्ताव मंज़ूर कर लिया गया तो दीपक मिश्रा महाभियोग का सामना करने वाले देश के पहले चीफ़ जस्टिस होंगे।
महाभियोग क्या है?
महाभियोग वह प्रक्रिया है जिसका प्रयोग राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए किया जाता है। इसका ज़िक्र संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में मिलता है।
महाभियोग प्रस्ताव सिर्फ़ तब लाया जा सकता है जब संविधान का उल्लंघन, दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित हो गयी हो। नियमों के मुताबिक़, महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।
लोकसभा में इसे प्रस्तुत करने के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए होंगे जबकि राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर ज़रूरी होते हैं।
तीन सदस्यीय समिति:
यदि उस सदन के स्पीकर या अध्यक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लें (वे इसे ख़ारिज भी कर सकते हैं) तो तीन सदस्यों की एक समिति बनाकर आरोपों की जांच करवाई जाती है। उस समिति में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक ऐसे प्रख्यात व्यक्ति को शामिल किया जाता है जिन्हें स्पीकर या अध्यक्ष उस मामले के लिए सही मानें।
अगर यह प्रस्ताव दोनों सदनों में लाया गया है तो दोनों सदनों के अध्यक्ष मिलकर एक संयुक्त जांच समिति बनाते हैं। जांच पूरी हो जाने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या अध्यक्ष को सौंप देती है जो उसे अपने सदन में पेश करते हैं।
वोटिंग:
प्रस्ताव पारित होने के लिए उसे सदन में स्पेशल मेजॉरिटी मिलना ज़रूरी है। अगर दोनों सदन में ये प्रस्ताव पारित हो जाए तो इसे मंज़ूरी के लिए राष्ट्रपति को भेजा जाता है। किसी जज को हटाने का अधिकार सिर्फ़ राष्ट्रपति के पास है।
सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी को महाभियोग का सामना करने वाला पहला जज माना जाता है। उनके ख़िलाफ़ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया क्योंकि उस वक़्त सत्ता में मौजूद कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया और प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला।
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