कावेरी नदी जल विवाद
कावेरी नदी जल विवाद......
- भारतीय संविधान के अनुसार कावेरी एक अंतर्राज्यीय नदी है। कर्नाटक और तमिलनाडु इस कावेरी घाटी में पड़ने वाले प्रमुख राज्य हैं। इसलिए दोनों ही इस पर अपना हक जता रहे थे। लेकिन इस घाटी का एक हिस्सा केरल में भी पड़ता है और समुद्र में मिलने से पहले ये नदी कराइकाल से होकर गुजरती है, जो पुडुचेरी का हिस्सा है। इसलिए इस नदी के जल के बंटवारे को लेकर इन चारों राज्यों में विवाद का एक लंबा इतिहास रहा है। चारों राज्य ही इस नदी पर अपना अधिकार जताते आ रहे हैं।
विवाद की असली जड़ मद्रास-मैसूर एग्रीमेंट 1924 को माना जाता है। विवाद के निपटारे के लिए 1990 में केंद्र सरकार ने एक ट्रायब्यूनल बनाया जिसे पानी की किल्लत की समस्या पर गौर फरमाना था। 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर राज के बीच ही यह विवाद था और दोनों के बीच पानी को लेकर समझौता भी हो गया। लेकिन
बाद में इस विवाद में केरल और पुडुचेरी भी शामिल हो गए जिससे यह विवाद गहरा गया।
-जुलाई 1986 में तमिलनाडु ने अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) के तहत इस मामले को सुलझाने के लिए आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार से एक न्यायाधिकरण के गठन किए जाने का निवेदन किया। हालांकि केंद्र बातचीत के जरिए इस विवाद को सुलझाना चाहती थी। लेकिन तमिलनाडु के किसानों की याचिका की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस मामले में न्यायाधिकरण गठित करने का निर्देश देना पड़ा था।
-केंद्र सरकार ने 2 जून 1990 को न्यायाधिकरण का गठन किया।
-1991 में न्यायाधिकरण ने एक अंतरिम आदेश पारित किया जिसमें कहा गया था कि कर्नाटक कावेरी जल का एक तय हिस्सा तमिलनाडु को देगा। हर महीने कितना पानी छोड़ा जाएगा, यह भी तय किया गया लेकिन इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ। इस बीच तमिलनाडु इस अंतरिम आदेश को लागू करने के लिए जोर देने लगा। इस आदेश को लागू करने के लिए एक याचिका भी उसने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की पर तबसे मामला और पेचीदा ही होता गया।
-जल बंटवारे को लेकर साल 2007 में कावेरी वॉटर डिसप्यूट ट्रायब्यूनल (सीडब्लूडीटी) के फैसले के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल ने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई थी।
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